भारत में मंदी: भारत में युवा नौकरी जाने की सबसे बुरी मार झेल रहे हैं

 03 Sep 2020 ( आई बी टी एन ब्यूरो )
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सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के मुताबिक़, भारत में लॉकडाउन लगने के एक महीने के बाद से क़रीब 12 करोड़ लोग अपने काम गंवा चुके हैं। अधिकतर लोग असंगठित और ग्रामीण क्षेत्र से हैं।

भारत की चालीस करोड़ नौकरियों में से अधिकांश असंगठित क्षेत्रों में ही हैं।

सीएमआईई के मुताबिक़, लॉकडाउन के दौरान अप्रैल के महीने में ऐसे सात करोड़ लोगों ने जिन्होंने अपना काम-धंधा गंवाया था, वो वापस काम पर लौट चुके हैं।

दोबारा आर्थिक गतिविधियों के शुरू होने और फ़सल की अच्छी पैदावर की वजह से ऐसा हो पाया है क्योंकि इससे ना सिर्फ़ बड़े पैमाने पर लोगों को काम मिला है बल्कि कृषि क्षेत्र में भी लोगों को अतिरिक्त काम मिला है।

राष्ट्रीय स्तर पर चलने वाली जॉब गारंटी योजना ने भी इसमें मदद की है लेकिन यह ख़ुशख़बरी यहीं तक सीमित है।

सीएमआईई के आकलन के मुताबिक़, वेतन पर काम करने वाले संगठित क्षेत्र में 1.9 करोड़ लोगों ने अपनी नौकरियां लॉकडाउन के दौरान खोई हैं।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और एशियन डेवलपमेंट बैंक की एक अन्य रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया है कि 30 की उम्र के नीचे के क़रीब चालीस लाख से अधिक भारतीयों ने अपनी नौकरियाँ महामारी की वजह से गंवाई हैं। 15 से 24 साल के लोगों पर सबसे अधिक असर पड़ा है।

सीएमआईई के मैनेजिंग डायरेक्टर महेश व्यास का कहना है, ''ज़्यादातर 30 साल से कम उम्र वाले प्रभावित हुए हैं। कंपनियाँ अनुभवी लोगों को रख रही हैं और नौजवानों पर इसकी मार पड़ रही है।''

कई लोग मानते हैं कि यह भारत की धीमी होती अर्थव्यवस्था का सबसे चिंताजनक पहलू है।

महेश व्यास बताते हैं, ''ट्रेनी और प्रोबेशन पर काम करने वाले अपनी नौकरियाँ गंवा चुके हैं। कंपनियाँ कैंपस में जाकर नौकरियां नहीं दे रही हैं। किसी भी तरह की कोई नियुक्ति नहीं हो रही है। जब 2021 में काम की तलाश करने वाले युवाओं का अगला बैच ग्रेजुएट होगा तो वो बेरोज़गारों की फ़ौज में शामिल होंगे।''

नए ग्रेजुएट हुए लोगों को नौकरी नहीं देने का मतलब होगा आमदनी, शिक्षा और बचत पर विपरीत प्रभाव पड़ना।

महेश व्यास कहते हैं, ''इससे नौकरी की तलाश करने वालों, उनके परिवार, अर्थव्यवस्था सब पर असर होगा।''

सैलरी में कटौती और मांग में सुस्ती आने से घरेलू आय पर भी नकारात्मक असर होगा।

पिछले साल के सीएमआईई के सर्वे में पाया गया था कि क़रीब 35 प्रतिशत लोग मानते थे कि उनकी आय पिछले साल की तुलना में बेहतर हुई है जबकि इस साल सिर्फ़ दो फ़ीसद लोगों का ऐसा मानना है।

निम्न वर्ग से लेकर उच्च मध्यम वर्ग तक के लोगों की आमदनी में कटौती हुई है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक़, वेतनभोगी लोगों ने लॉकडाउन के चार महीनों में क़रीब चार अरब डॉलर अपने ज़रूरी बचत से निकाला ताकि वो नौकरी जाने और सैलरी में हुई कटौती की भारपाई कर सकें।

महेश व्यास कहते हैं, ''आय में आई कमी की ख़ासतौर पर मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग पर मार पड़ी है।''

नौकरी नहीं रहने की वजह से ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के हाथ से काम-धंधा छीन रहा है। लेकिन यह कोई अचानक से आयी तब्दीली नहीं है।

अर्थशास्त्री विनोज अब्राहम की ओर से 2017 में किए गए अध्ययन में यह बात साफ़ तौर पर सामने आयी थी कि 2013-14 और 2015-16 के बीच रोज़गार में आज़ादी के बाद संभवत: पहली बार इतनी भारी गिरावट आई है। यह अध्ययन श्रम ब्यूरो से इकट्ठा किए गए डेटा को आधार बनाकर किया गया था।

श्रम भागीदारी से अर्थव्यवस्था में सक्रिय कार्यबल का पता चलता है। सीएमआईई के मुताबिक़, यह श्रम भागीदारी 8 नवंबर 2016 में लागू की गई नोटबंदी के बाद 46 फ़ीसद से घटकर 35 फ़ीसद तक पहुँच गई थी। इसने भारत की अर्थव्यवस्था को बहुत बुरी तरह से प्रभावित किया। वर्तमान में मौजूदा 8 फ़ीसद की बेरोज़गारी दर इस बदतर स्थिति की हक़ीक़त बयां नहीं करती है।

महेश व्यास कहते हैं, ''ऐसा तब होता है जब नौकरी की तलाश करना बेकार हो जाता है क्योंकि नौकरी रहती ही नहीं है।''

आर्थिक असुरक्षा भारत में काफ़ी बढ़ चुकी है।

शोधकर्ता मैरिएन बर्ट्रेंड, कौशिक कृष्णन और हीथर स्कॉफिल्ड ने इस पर अध्ययन किया है कि भारतीय, लॉकडाउन की चुनौतियों से कैसे निपट रहे हैं?

इन शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया है कि सिर्फ़ 66 फ़ीसद घरों के पास आर्थिक संकट का सामना करने के लिए दूसरे हफ्ते से ज़्यादा का संसाधन मौजूद है।

भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी कह चुकी हैं कि सरकार नौकरी जाने की बात से इनकार नहीं करती है।

पिछले वित्त वर्ष के मासिक औसत की तुलना में जून में नई नौकरियों की संख्या में भी 60 फ़ीसद की गिरावट आई है।

पिछले हफ़्ते निर्मला सीतारमण ने यह भी कहा, ''भारत एक दैवीय घटना जैसी असामान्य स्थिति से गुज़र रहा है ... इस दौरान हम अर्थव्यवस्था में संकुचन देख सकते हैं।''

भारत में कोरोना संक्रमण के मामले 38 लाख के क़रीब होने जा रहे हैं और अर्थव्यवस्था ठप पड़ी हुई है। अर्थव्यवस्था में पूरी तरह से सुधार की गुंजाइश अभी दूर की कौड़ी नज़र आ रही है। असंगठित क्षेत्र की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ रही है।

लॉकडाउन के दौरान जिन लोगों के काम छूट गए थे और जो अपने गांव लौट चुके थे, वो अब लॉकडाउन की पाबंदियाँ हटने के साथ ही अपने काम की जगहों पर लौटना शुरू कर चुके हैं।

इनमें से कुछ को ज़्यादा पैसे भी दिए जा रहे हैं क्योंकि उनको काम पर रखने वाले जल्दी से जल्दी अपना व्यवसाय फिर से शुरू करना चाहते हैं।

लेबर इकोनॉमिस्ट के आर श्याम सुंदर का कहना है, ''इस साल के अंत तक अर्थव्यवस्था खुलने के साथ ही बहुत सारे लोग अपने काम पर लौट आएंगे लेकिन वेतन पर काम करने वाले लोगों को समय लगेगा।''

भारत में अगस्त में भी सर्विस सेक्टर में सुधार नहीं, जा रही हैं नौकरियां

कोरोना महामारी के चलते कारोबारी गतिविधियों में रुकावट आने और मांग कम होने के चलते भारत के सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) में लगातार छठे महीने गिरावट देखने को मिली है।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक इंडस्ट्री सर्वे के हवाले से रिपोर्ट दी है कि कारोबारी गतिविधियां प्रभावित होने से अगस्त में भी नौकरियां जाने का सिलसिला जारी है।

सर्वे कहता है कि अर्थव्यवस्था के अप्रैल से लेकर जून दूसरी तिमाही में सिकुड़ने के बाद सर्विस सेक्टर में सुधार में लंबा समय लगेगा।

आईएचएस मार्किट में अर्थशास्त्री श्रेया पटेल ने न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स को बताया, ''भारत के सर्विस सेक्टर में अगस्त में भी कारोबार संचालन की स्थितियां चुनौतिपूर्ण बनी हुई हैं। घरेलू और विदेशी बाज़ारों में लॉकडाउन के प्रतिबंधों का उद्योग पर बहुत बुरा असर पड़ा है।''

अर्थव्यवस्था को और नुक़सान से बचाने के लिए सरकार ने कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों के बीच भी अंडरग्राउंड ट्रेन नेटवर्क्स खोलने, खेल से जुड़े और धार्मिक आयोजनों की सीमित अनुमति दी है।

हालांकि, माना जा रहा है कि प्रतिबंधों में ढील के बावजूद भी आर्थिक गतिविधियों के फिर से सामान्य होने में काफी समय लगेगा क्योंकि लोग खुद भी घर से बाहर कम निकल रहे हैं और मॉल, सिनेमा हॉल, रेस्तरां और होटल जाने से बच रहे हैं।

घरेलू और विदेशी दोनों स्तर पर मांग कम होने से उत्पादन कम हो रहा है और इसके कारण अब भी लोगों की नौकरियां जा रही हैं।

 

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